Raja Prithu: 13वीं शताब्दी की शुरुआत में कामरूप (अब असम) पर खेन राजवंश के राजा पृथु राय का शासन था। पृथु राय को जलपेश्वर भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस राजवंश का संबंध नरकासुर से था। इस राजवंश के लोग देवी दुर्गा के एक रूप कामेश्वरी के उपासक थे।
जबकि बख्तियार खिलजी एक आक्रांता था, जो भारत लूटपाट के मकसद से आया था। यह वही बख्तियार था, जिसने प्राचीन भारतीय विश्वविद्यालय नालंदा को साल 1193 में तबाह करके जला दिया था। नालंदा विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में 90 लाख पांडुलिपियां और हजारों पुस्तकें मौजूद थीं। इस विश्वविद्यालय में लगभग 10000 छात्र और दो हजार शिक्षक थे। इस विश्वविद्यालय में सिर्फ भारत से ही नहीं बल्कि कई देशों के छात्र पढ़ने के लिए आते थे।
बख्तियार खिलजी और कामरूप के राजा के बीच युद्ध
जब बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को तबाह कर बंगाल के राजा लक्ष्मण सेन को भी पराजित कर दिया था, तो उसका हौसला और बढ़ गया। उसने तिब्बत के बौद्ध साम्राज्य पर चढ़ाई करने का फैसला किया। हालांकि वहां चढ़ाई करने से पहले उसे कामरूप राज्य को पार करना था। अतः वह 1205 के अंतिम दिनों में 12 हजार घुड़सवार सैनिकों के साथ कामरूप पर चढ़ाई के लिए निकल पड़ा
उस समय कामरूप पर राजा पृथु राय का शासन था। जबकि पहाड़ी दुर्गम इलाकों के बारे में बख्तियार खिलजी अनभिज्ञ था। इसलिए वह जब कामरूप से कुछ मील की दूरी पर था, तब उसने एक स्थानीय जनजातीय समुदाय पर हमला किया और उनके सरदार से दोस्ती करके उसे इस्लाम में धर्मान्तरित करवा दिया। इस तरह उस सरदार का नाम अली हो गया। आगे इसी अली ने खिलजी की सेना का मार्गदर्शन किया।
इन सारे घटनाक्रम पर राजा पृथु राय की नजर थी। उन्होंने आसपास के क्षेत्रों में रहने वाली स्थानीय जनजातियों की मदद से एक सेना तैयार की। खिलजी और उसकी सेना को कामरूप राज्य तक पहुंचने के लिए पहाड़ी इलाकों और घने जंगलों को पार करना पड़ा। इस दौरान खिलजी की सेना ने रास्ते में जो कुछ मिला उसे लूट लिया। उधर, जवाबी कार्रवाई में राजा पृथु राय के सैनिकों ने बख्तियार खिलजी की सेना पर हमला कर दिया।
इस अभियान में खिलजी की सेना के लगभग छह हजार सैनिक मारे गए। बाकी बचे सैनिक अफरातफरी के माहौल में इधर-उधर भागने लगे। इस युद्ध में राजा पृथु राय की जीत होते देख खिलजी पीछे हटने लगा। उसे हार का आभास हो गया था। हालांकि, राजा पृथु युद्ध मैदान में डटे रहे। बख्तियार खिलजी किसी तरह कुछ सैनिकों के साथ युद्ध के मैदान से भागने में सफल रहा। बाकी बचे सैनिकों ने राजा पृथु के सामने आत्मसमर्पण कर दिया
जान बचाने के लिए ली मंदिर में शरण
बख्तियार अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगा और एक मंदिर में जाकर छिप गया। गौरतलब है बख्तियार ने उसी मंदिर को अपनी शरणस्थली बनाया, जिन्हें वह ध्वस्त करता आया था। उधर, राजा पृथु राय ने बख्तियार को खोजने के लिए तलाशी अभियान शुरू कर दिया। जल्दी ही राजा को पता चला कि बख्तियार एक मंदिर में शरणागत है। मगर उन्होंने मंदिर परिसर के अंदर खिलजी को न मारने का आदेश जारी कर दिया। यही नहीं, उन्होंने उस मंदिर के चारों ओर बांस के खूंटे से एक दीवार सी बनाकर उसे घेर कर रखने का भी आदेश दिया।
संभवतः वह मंदिर के अंदर शत्रु का वध करके मंदिर की पवित्रता नष्ट नहीं करना चाहते थे। आखिरकार भूख और प्यास से खिलजी और उसके बचे हुए सैनिक बेहाल होने लगे। मृत्यु को सामने देखकर सैनिकों के बीच लड़ाई-झगड़े होने लगे। कुछ लोग मंदिर परिसर में ही रहना चाहते थे और कुछ वहां से भागना चाहते थे। इसी बीच खिलजी सेना की एक टोली तीव्र गति से आकर बांस की दीवार तोड़कर बोर नदी की ओर बढ़ गयी और बाकी बचे सैनिक भी उनके पीछे भागने
तभी पीछे से कामरूपी सेना का आक्रमण आरंभ हो गया। इस हमले में कई सैनिक घोड़े सहित नदी में कूद गये और उनमें से कुछ डूबकर भी मर भी गये। बाकि बचे हुए सैनिक ही बख्तियार खिलजी के साथ दूसरे किनारे पर पहुंच सके।
आखिरकार इस हमले से किसी तरह अपनी जान बचाकर बख्तियार और उसके बचे सैनिक बंगाल भागने में सफल रहे। जब पराजित खिलजी अपमानित होकर बंगाल पहुंचा तो वह हार से इतना टूट गया कि उसे बाहर निकलने में शर्म महसूस होने लगी और वह बीमार रहने लगा। अंत इस हार की खबर उसके एक सेनापति अली मरदान को मिली तो उसने रात के अंधेरे में बख्तियार खिलजी की चाकू मारकर हत्या कर दी।लगे।
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